दिनांक:15/08/2026
हापुड़ से ब्यूरो रिपोर्ट
आजादी के नायक बाबू ब्रिज बिहारी लाल: क्रांतिकारियों को दी पनाह, जेल में ली अंतिम सांस।
बुलंदशहर। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब पूरा देश आजादी के अमर नायकों को याद कर रहा है, ऐसे में बुलंदशहर के उस महान स्वतंत्रता सेनानी को स्मरण करना भी जरूरी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना पेशा, संपत्ति और अंततः अपना जीवन तक न्योछावर कर दिया। बाबू ब्रिज बिहारी लाल स्वतंत्रता आंदोलन के ऐसे कर्मठ सेनानी थे, जिन्होंने वकालत के साथ-साथ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने, स्वतंत्रता सेनानियों की आर्थिक और कानूनी मदद करने तथा ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन त्याग, साहस, सेवा और राष्ट्रभक्ति की ऐसी मिसाल है, जिसे बुलंदशहर के इतिहास में हमेशा याद किया जाता रहेगा।बाबू ब्रिज बिहारी लाल का जन्म वर्ष 1889 में बुलंदशहर नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम बाबू भगवती सहाय था। कायस्थ परिवार में जन्मे ब्रिज बिहारी लाल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए एमए और एलएलबी की डिग्री हासिल की। वर्ष 1919 से 1942 तक उन्होंने बुलंदशहर में वकालत की और फौजदारी मामलों के प्रतिष्ठित अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। लेकिन उनके लिए वकालत केवल पेशा नहीं थी। देश जिस दौर से गुजर रहा था, उसमें उन्होंने अपनी सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया।

वर्ष 1920 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद वह बुलंदशहर जिला कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। संगठन को मजबूत करने से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों की मदद तक, उन्होंने हर स्तर पर अपना योगदान दिया।जनसेवा के क्षेत्र में भी बाबू ब्रिज बिहारी लाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष 1928 में वह बुलंदशहर नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसके बाद वर्ष 1937 में वह बुलंदशहर से संयुक्त प्रांत की विधानसभा के सदस्य चुने गए। यह वह दौर था जब भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रांतीय चुनाव हुए थे। राजनीतिक जिम्मेदारी मिलने के बावजूद उनका जुड़ाव आम जनता और स्वतंत्रता आंदोलन से लगातार बना रहा।बाबू ब्रिज बिहारी लाल की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता। बुलंदशहर जिला बार के प्रतिष्ठित फौजदारी अधिवक्ता होने के बावजूद उन्होंने अपनी आय का बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता आंदोलन में लगा दिया। कांग्रेस के प्रांतीय कोष में आर्थिक सहयोग देने के साथ-साथ वह जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की सहायता करते थे। ब्रिटिश शासन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों पर चलने वाले मुकदमों में वह कई बार बिना पेशेवर शुल्क लिए उनकी पैरवी करते थे।

यही नहीं, ब्रिटिश शासन की नजरों से बचकर निकलने वाले राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं और भूमिगत क्रांतिकारियों के लिए उनका नलगढ़ा फार्म भी महत्वपूर्ण सुरक्षित ठिकाना बन गया था। यमुना नदी के दक्षिणी तट पर स्थित नलगढ़ा में उनके कृषि फार्म पर स्वतंत्रता सेनानियों को भोजन, विश्राम और आश्रय मिलने की जानकारी सामने आती है।ब्रिटिश शासन को जब इस गतिविधि की भनक लगी तो ब्रिटिश सीआईडी ने 7 नवंबर 1930 को नलगढ़ा फार्म पर छापा मारा। तलाशी के बाद वहां खड़ी फसल को घुड़सवार पुलिस ने नष्ट कर दिया और हथियार भी जब्त किए गए। फार्म को सैन्य पुलिस की निगरानी में रखा गया। इस घटना का उल्लेख राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में सुरक्षित ब्रिटिश गुप्तचर रिपोर्ट में भी मिलता है। यह घटना इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि बाबू ब्रिज बिहारी लाल का योगदान केवल सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों की मदद के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाने से भी पीछे नहीं हटते थे।

समय बीतता गया और देश का स्वतंत्रता आंदोलन निर्णायक दौर में पहुंच गया। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से आंदोलन का आह्वान हुआ और देशवासियों को ‘करो या मरो’ का संदेश दिया गया। इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने कांग्रेस नेताओं और आंदोलनकारियों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू कर दीं।इसी आंदोलन के दौरान बाबू ब्रिज बिहारी लाल को अगस्त 1942 में बुलंदशहर के नलगढ़ा क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन की पहली गिरफ्तारी थी। ब्रिटिश सरकार ने उन पर भारत रक्षा नियम, 1939 के तहत मुकदमा चलाया। 24 सितंबर 1942 को अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए तीन माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई।लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सजा के दौरान बुलंदशहर जिला कारागार में ही बाबू ब्रिज बिहारी लाल का निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र महज 53 वर्ष थी। जिस व्यक्ति ने जीवन भर स्वतंत्रता सेनानियों को कानूनी सहायता दी, आर्थिक मदद की और जरूरत पड़ने पर अपने संसाधनों को आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया, उसने अंततः देश की आजादी के संघर्ष में जेल के भीतर ही अपने प्राण त्याग दिए।

आजादी के बाद भी उनके योगदान को भुलाया नहीं गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दी। 22 जून 1956 को तत्कालीन संसदीय सचिव बनारसी दास ने भी उन्हें 1942 के आंदोलन में सक्रिय रहते हुए दिवंगत हुए अनुभवी कांग्रेस नेता के रूप में वर्णित किया था। उनका नाम उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग से संबंधित स्वतंत्रता सेनानी पुस्तकों और बुलंदशहर के विभिन्न स्मृति-ग्रंथों में दर्ज है।बाबू ब्रिज बिहारी लाल की स्मृति को आगे बढ़ाने के लिए बुलंदशहर में उनके सम्मान में स्मारक द्वार का निर्माण भी कराया गया। 6 दिसंबर 2003 को तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने इस स्मारक द्वार का उद्घाटन किया था। यह स्मारक आज भी उनके संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है।बाबू ब्रिज बिहारी लाल की कहानी केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं है। यह उस पीढ़ी की कहानी है जिसने देश की आजादी के लिए व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने वकालत से मिलने वाली आय को जनसेवा और स्वतंत्रता आंदोलन में लगाया, स्वतंत्रता सेनानियों को कानूनी सहायता दी, उनके परिवारों की मदद की, अपने फार्म को जरूरतमंद आंदोलनकारियों के लिए सुरक्षित स्थान बनने दिया और अंततः जेल में अपने प्राणों की आहुति दे दी।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब हम तिरंगे को सलाम करते हैं और आजादी का जश्न मनाते हैं, तब यह याद रखना भी जरूरी है कि यह स्वतंत्रता हमें लंबे संघर्ष, त्याग और बलिदानों के बाद मिली है। बाबू ब्रिज बिहारी लाल जैसे अनेक स्थानीय नायकों का योगदान इतिहास के बड़े पन्नों के बीच भले ही सीमित दिखाई देता हो, लेकिन राष्ट्र की स्वतंत्रता की नींव में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा।बुलंदशहर के इस अमर स्वतंत्रता सेनानी का जीवन आज की पीढ़ी को यह संदेश देता है कि देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं होती। जरूरत पड़ने पर अपने संसाधन, अपना समय, अपना पेशा और यहां तक कि अपना जीवन भी राष्ट्र के लिए समर्पित करना ही सच्ची देशसेवा है। बाबू ब्रिज बिहारी लाल ने अपने जीवन से इसी भावना को साबित किया।आज स्वतंत्रता दिवस पर बुलंदशहर अपने इस महान सपूत को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है। देश की आजादी के लिए अपना पेशा, संपत्ति और जीवन समर्पित करने वाले बाबू ब्रिज बिहारी लाल का नाम बुलंदशहर के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में हमेशा सम्मान और गर्व के साथ याद किया जाता रहेगा।





